Mukund Prakash Mishra: लाखों का पैकेज ठुकराया, जनसेवा को बनाया मिशन… कौन हैं ‘शिवहर के RTI मैन’?
Navachar Bharat Exclusive: सिस्टम की जकड़न तोड़ने वाला ‘शिवहर का आरटीआई मैन’, जिसने लाखों के पैकेज को ठुकरा कर चुनी जनसेवा की राह
शिवहर (नवाचार भारत डेस्क): अक्सर युवा इंजीनियरिंग की शानदार डिग्री हासिल करने के बाद AC कमरों और लाखों के पैकेज का सपना देखते हैं। लेकिन क्या कोई ऐसा भी हो सकता है, जो मल्टीनेशनल कंपनियों के ऑफर ठुकरा कर अपने ज़िले की धूल-फांकती और भ्रष्टाचार में डूबी व्यवस्था को सुधारने निकल पड़े?
भारत में ‘सूचना का अधिकार’ (RTI) एक ऐसा कानून है, जिसने आम आदमी को सीधे सरकार और प्रशासन की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछने की ताकत दी है। इसी ताकत की जीती-जागती मिसाल हैं बिहार के शिवहर जिले के युवा RTI activist Mukund Prakash Mishra। पिछले एक दशक से मुकुंद शिवहर में सिस्टम की मनमानी, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के खिलाफ एक अभेद्य ढाल बनकर खड़े हैं।

Mukund Prakash Mishra कौन हैं?
नगर परिषद शिवहर के वार्ड 14, मिश्रा टोला के रहने वाले Mukund Prakash Mishra एक उच्च शिक्षित युवा हैं। उनके पिता जयप्रकाश मिश्रा सेवानिवृत्त प्रखंड कृषि पदाधिकारी हैं। मुकुंद ने नेताजी सुभाष इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, बिहटा (पटना) से बी.टेक की पढ़ाई पूरी की। वर्ष 2014 में उनके पास कई बड़ी कंपनियों से नौकरी के शानदार प्रस्ताव थे। लेकिन अन्ना हजारे के जनलोकपाल आंदोलन से प्रेरित मुकुंद ने सुख-सुविधाओं वाली ज़िंदगी ठुकरा दी।
अपने ज़िले की बदहाली को देखकर उन्होंने समाज सेवा का संकल्प लिया और वापस शिवहर लौट आए। शुरुआत में गुज़ारे के लिए उन्होंने एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ाया, लेकिन उनका असल और इकलौता लक्ष्य ‘सिस्टम की सफाई’ करना था।

Mukund Prakash Mishra ने RTI के जरिए क्या सवाल उठाए?
आज मुकुंद शिवहर के हर उस गरीब और शोषित व्यक्ति की आवाज़ बन चुके हैं, जिसकी फाइलों को सरकारी बाबू दबाकर भूल जाते हैं। मुकुंद अब तक विभिन्न सरकारी विभागों में 5,000 से अधिक RTI आवेदन लगा चुके हैं। इनमें से 2500 से ज़्यादा आवेदन सीधे तौर पर प्रशासनिक अधिकारियों से तीखे सवाल-जवाब के रूप में रहे हैं।
उनकी आरटीआई सिर्फ सरकारी फाइलों में धूल नहीं खाती, बल्कि ज़मीन पर उसका सीधा और कड़ा असर दिखता है।

शिवहर में RTI एक्टिविस्ट Mukund Prakash Mishra की भूमिका
रेलवे लाइन का सूखा खत्म: शिवहर-सीतामढ़ी 78.92 किमी लंबी रेल लाइन के लिए मुकुंद ने सिर्फ आरटीआई ही नहीं लगाई, बल्कि पटना हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) भी दायर की। इसी का नतीजा था कि हाईकोर्ट ने रेलवे और बिहार सरकार को तलब किया और बापूधाम-शिवहर-सीतामढ़ी रेल परियोजना ने रफ़्तार पकड़ी।

शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति: शिवहर में डिग्री कॉलेज की स्थापना की मांग और नवाब उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में लड़कियों के नामांकन की शुरुआत, मुकुंद के अथक प्रयासों का ही सीधा परिणाम है।

स्वास्थ्य व्यवस्था की खोली पोल: शिवहर सदर अस्पताल में जब 2 वेंटिलेटर को चूहों ने कुतर दिया था और एक्सपायर्ड दवाइयां बांटी जा रही थीं, तब मुकुंद की आरटीआई ने ही तहलका मचाया था। तत्कालीन डीएम को मजबूरन बड़ी कार्रवाई करनी पड़ी। उनके हस्तक्षेप से ही रेफरल अस्पतालों में चिकित्सकों की मनमानी पर रोक लगी।

सड़क और इंफ्रास्ट्रक्चर: बीआरसी रोड का निर्माण, बेलवा घाट में बागमती नदी पर डैम का पूरा होना और दशकों से पेंडिंग दर्जनों सड़कों का काम आरटीआई के दबाव में ही शुरू हो पाया।

भ्रष्टाचार पर कड़ा प्रहार: सड़कों और मनरेगा योजनाओं में हो रही धांधली को उजागर कर मुकुंद ने दो दर्जन से अधिक ठेकेदारों पर कार्रवाई करवाई। इसके अलावा, अवैध आरा मिलें बंद हुईं और शहर की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे तथा स्ट्रीट लाइटें लगाई गईं।

98% पेंडिंग मामले और सिस्टम की गहरी नींद

मुकुंद का यह सफर बाहर से जितना प्रेरणादायक लगता है, अंदर से उतना ही चुनौतीपूर्ण है। ‘नवाचार भारत’ की पड़ताल में सिस्टम की एक कड़वी सच्चाई सामने आई है। मुकुंद द्वारा उठाए गए करीब 2500 बड़े मामलों में से बमुश्किल 50 मामलों (मात्र 2%) में ही प्रशासनिक अधिकारियों ने कोई ठोस कार्रवाई की है। 98% मामले आज भी पेंडिंग हैं, या फिर प्रशासन सिर्फ कागजी जवाब देकर अपना पल्ला झाड़ लेता है।
दाखिल-खारिज (Land Mutation) से लेकर कर्मचारियों को सातवें वेतनमान का लाभ दिलाने तक, मुकुंद हर मोर्चे पर लड़ रहे हैं। अधिकारियों की नाराज़गी और व्यवस्था का कड़ा विरोध झेलने के बावजूद, वे बिना डरे पटना हाईकोर्ट से लेकर ज़िला प्रशासन तक आम आदमी की लड़ाई लड़ रहे हैं।

शिवहर को है मुकुंद जैसे युवाओं की ज़रूरत

आज के दौर में जहां ज़्यादातर युवा सिर्फ राजनीति में पद या निजी करियर में सफलता ढूंढ रहे हैं, वहां मुकुंद प्रकाश मिश्रा का यह निस्वार्थ संघर्ष एक मिसाल है। उन्होंने साबित कर दिया है कि अगर एक अकेला व्यक्ति भी ठान ले, तो वह पूरे सरकारी महकमे की नींद उड़ा सकता है।
मुकुंद ने शिवहर की जनता को एक सबसे बड़ा लोकतांत्रिक पाठ पढ़ाया है— “अधिकार मांगे नहीं जाते, सिस्टम से छीनने पड़ते हैं।”
